India is becoming a terrorized country

शनिवार, 12 अगस्त 2017

India is becoming a terrorized country
Avdhash Kaushal
Terrorism is the global buzz word now a days; we are all facing all kinds of it every day in one form or the other. State agencies have defined terrorism, and all countries have a different version. While each definition is a bit different, but the theme is constant. These themes include premeditated terrorist acts that are motivated by some political or social agenda; terrorists generally target non-combatants or civilians and are generally sub-national or clandestine groups. The configuration of terrorist groups is generally dependent on one's environment, relationship with the state, motivation and/or goals.
The 8th report on terrorism in India published in 2008 defined terrorism as the peacetime equivalent of war crime. An act of terror in India includes any intentional act of violence that causes death, injury or property damage, induces fear, and is targeted against any group of people identified by their political, philosophical, ideological, racial, ethnic, religious or any other nature. This description is similar to one provided by the United Nations' in 2000.
The history of modern terrorism began with the French revolution and has evolved ever since. The most common or roots of terrorism are culture clashes, globalization, religion, Israeli-Palestinian conflict, or the Russian invasion of Afghanistan. More personal or individual-based reasons for terrorism are frustration, deprivation, negative identity, narcissistic rage, and/or moral disengagement.
If generalized, there are five types of terrorism-.
  • Dissent terrorism, which are terrorist groups which have rebelled against their government. These are those factions of population that demand to be heard. When their voices fall on deaf ears, no authority makes an effort to redress their demands, out of sheer frustration, these people pick up gun and walk on the wrong path
  • Terrorists and the Left and Right, which are groups rooted in political ideology, like we see Maoism and Naxalism in our country. These groups take up arms to force their political will on the masses.
  • Religious terrorism, which are those groups which are extremely religiously motivated. In India, under the garb of customs and traditions many things happen that are clearly act of terrorism like opposition to inter caste marriages, khap panchayats, honor killings, female genital mutilation, female feticide etc. Aggression and non tolerance shown by the members of major religious group can also be placed under it.
  • Criminal Terrorism, which are terrorists acts used to aid in crime and criminal profit. Narcotics, human trafficking, smuggling etc can be covered under this. A new section here to be added is Real estate, where for monetary gains, people are terrorized to evict their places, or their houses, shops, fields are snatched away of some measly amount.
  • Terrorism from across the border, this is sponsored by the neighboring countries wanting to create instability and destroy the peace in the Nation. Pakistan and Afghanistan are classic examples of it.
  • State terrorism, which consists of terrorist acts by a state or government. This is by all means the worst kind of terrorism as no one can raise voice against it, citizens are afraid to express their opinion. Any dissent is quickly and effortlessly neutralized as State is powerful with entire machinery at its disposal. According to former Director of CBI, D.R Kartikeyan, a terrorist is a person whose worries are not addressed by the state. The bureaucrats can play a positive role here by addressing the grievances of the masses by hearing them patiently and making an effort to redress them

India is one of the worst hit countries when it comes to Terrorism as all the above mentioned types are present in our nation and the impudence is that the state leaders claim that they take credit in making Terrorism a Global Agenda. Terrorism can be stopped and wiped out completely. The citizens of India have to rise together, without fear and fight against all the above mentioned terrorism. When there is mass awakening against this scourge, there is no denying that peace shall return.

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उत्तराखंड भाजपा का घमासान - मंत्री और मेयर में भिड़ंत

गुरुवार, 10 अगस्त 2017


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VIDEO: जेरुसलम में जहां रुकेंगे प्रधानमंत्री मोदी, वहां इजराइली गुट ने क्यों किया था बड़ा बम ब्लास्ट?

सोमवार, 3 जुलाई 2017

VIDEO: जेरुसलम में जहां रुकेंगे प्रधानमंत्री मोदी, वहां इजराइली गुट ने क्यों किया था बड़ा बम ब्लास्ट?










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RULERS ARE ALWAYS PUNISHED BY UTTARAKHAND VOTERS

रविवार, 25 दिसंबर 2016

मंत्रियों के लिये दुखदायी रहे हैं उत्तराखण्ड के चुनाव
जयसिंह रावत
उत्तराखण्ड की सत्ता पर बारी-बारी से काबिज होने वाले राजनीतिक दल और खासकर मतदाताओं को हसीन सपने दिखा कर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने वाले नेता हर चुनाव में पड़ रही मतदाताओं की मार की पीड़ा तो झेल रहे हैं मगर उस मार के पीछे छिपे संदेश को नहीं पढ़ रहे हैं। प्रदेश में अब तक हुये चुनावों में लगभग 60 प्रतिशत विधायक और 80 प्रतिशत से अधिक मंत्री चुनाव हारते रहे हैं। मतदाताओं के गुस्से की इन्तेहा देखिये, कि भारत में कुर्सी पर रहते हुये चुनाव हारने वाला तीसरा मुख्यमंत्री भी उत्तराखण्ड का ही था। मतदाताओं के निशाने पर कांग्रेस और भाजपा ही नहीं बल्कि उक्रांद और बसपा भी रहे हैं।R
नव गठित राज्य उत्तराखण्ड की चौथी विधनसभा के चुनावों का बिगुल बजने वाला है। अब केवल निर्वाचन आयोग द्वारा आचार संहिता और चुनाव कार्यक्रम की घोषणा का इन्तजार है। प्रदेश के 70 में से सभी वर्तमान विधायकों को उम्मीद है कि वे केवल अगली विधानसभा के लिये बल्कि सत्ता के गलियारों को एक बार फिर रौंदने के लिये वापस रहे हैं। लेकिन मतदाताओं के गुस्से की कहर का रिकार्ड बताता है कि इनमें से लगभग 60 प्रतिशत विधायक इस चुनावी समर में खेत रहेंगे। जो मंत्री सत्ता के नशे में चूर हो 5 साल तक स्वयं को शासक और अपने मतदाताओं को शासित प्रजा समझते रहे हैं उनके दिन अब गिनती के हैं। रिकार्ड बताता है कि 80 प्रतिशत से अधिक मंत्री अब तक चुनाव हारते रहे हैं।
सत्ता का सबसे अधिक दुरुपयोग मुख्यमंत्री के आसपास के लोगों या उनके खासमखास लोगों द्वारा किये जाने की शिकायतें रही हैं। लेकिन सत्ता का नशा ऐसा कि मुख्यमंत्री के नाम पर सत्ता का मजा लूटने वाले पिछला रिकार्ड नहीं देख रहे हैं। 2012 के चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने हारने का ऐसा रिकार्ड बनाया कि भारत के चुनावों के इतिहास में एक काला पन्ना अवश्य और जुड़ गया। उससे पहले उत्तर प्रदेश में टी.एन.सिंह और झारखण्ड में सिब्बू सोरेन ही मुख्यमंत्री रहते हुये चुनाव हारे थे। खण्डूड़ी की हार भी कोई छोटी-मोटी नहीं थी। वह 5 हजार से अधिक मतों से हारे जबकि प्रदेश में जीतने वाले 12 और 62 मतों से भी चुनाव जीतते रहे हैं।
नित्यानन्द स्वामी के नेतृत्व में गठित पहली कामचलाऊ सरकार में मुख्यमंत्री समेत कुल 13 मंत्राी थे। उन मंत्रियों ने स्वयं को कामचलाऊ सरकार के मंत्री नहीं माना। लगभग 11 महीने बाद जब सत्ता बदली और भगत सिंह कोश्यारी मुख्यमंत्री बने मगर मंत्रिमण्डल जैसा का तैसा ही रहा। सन्  2002 में जब प्रदेश के पहले चुनाव हुये तो उसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री कोश्यारी के अलावा बाकी सभी मंत्री चुनाव हार गये। उस चुनाव में प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी भी लक्ष्मण चौक से चुनाव हार गये थे। उस चुनाव में हारने वाले मंत्रियों में स्वामी के अलावा, बाद में बनने वाले मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, अजय भट्ट, केदार सिंह फोनिया, मातबर सिंह कंडारी, मोहन सिंह रावतगांववासी’, बंशीधर भगत, नाराण राम दास, राज्यमंत्री नारायण सिंह राणा, तीरथ सिंह रावत, सुरेश आर्य एवं निरुपमा गौड़ शामिल थे। उसके बाद देश के सबसे अनुभवी नेता नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में सरकार बनी। तिवारी तो हवा का रुख भांप कर पहले ही चुनाव मैदान से अलग हो गये। हालांकि अब तक राज्य में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वह तिवारी के ही कार्यकाल का है। तिवारी के मंत्रिमण्डल में पहले उनके सहित कुल 16 सदस्य थे जिनकी संख्या बाद में 12 हो गयी। फिर भी उन 16 में से केवल तीन मंत्री, प्रीतम सिंह, अमृता रावत और गोविन्द सिंह कुंजवाल ही चुनाव जीत पाये। बाद में मंत्रिमण्डल का आकर घटने पर भी उनके 9 मंत्री चुनावी मैदान में धराशाही हो गये। तिवारी के 12 सदस्यीय मंत्रिमण्डल के हारने वाले मंत्रियों में इंदिरा हृदयेश, नरेन्द्र सिंह भण्डारी, हीरा सिंह बिष्ट, तिलक राज बेहड़, नव प्रभात एवं साधूराम आदि शामिल थे।
वर्तमान में सत्ता की प्रबल दावेदार भाजपा के शासनकाल में नेताओं के हारने का रिकार्ड तो इतिहास में ही दर्ज हो गया। भाजपा के शासनकाल के अधिकांश मंत्री तो हारे ही हैं, लेकिन एक मुख्यमंत्री का चुनाव हारने का रिकार्ड भी भाजपा ने ही दिया है। भाजपा के शासनकाल में 2007 में पहले भुवन चन्द्र खण्डूड़ी के नेतृत्व में सरकार बनी और फिर उन्हें हटा कर रमेश पोखरियाल निशंक को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन जब चुनाव हुये तो स्वयं मुख्यमंत्री खण्डूड़ी के साथ ही उनके मंत्रियों में से मातबर सिंह कंडारी, बंशीधर भगत, प्रकाश पन्त, विशन सिंह चुफाल, दिवाकर भट्ट, एवं त्रिवेन्द्र रावत चुनाव हार गये। हरीश रावत जी के मंत्री पिछले पांच सालों तक राजा बन कर प्रजा पर शासन करते रहे। उनके कर्ताधर्ता भी सत्ता की दलाली रमजे लूटते रहे। मगर उन्हें इन दिनों अचानक शासित प्रजा के राजा होने का अहसास हो रहा है। वे अब सत्ता के गलियारे छोड़ कर गलियों और पगडंडियों पर पसीना बहा रहे हैं। मुख्यमंत्री जी अब भी नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके आसपास के लोग उनका कितना बड़ा नुकसान कर चुके हैं।
-जयसिंह रावत
-11, फ्रेंड्स एन्क्लेव, शाहनगर,
डिफेंस कालोनी रोड, देहरादून।
09412324999


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गोमांसः समाज को बांटने वाला एक और मुद्दा

बुधवार, 7 दिसंबर 2016


गोरक्षा के मुद्दे पर पहला बड़ा आंदोलन आज से ठीक 50 वर्ष पूर्व (नवंबर 1966) हुआ था और तब से यह मुद्दा जिंदा है। इसी मुद्दे को लेकर हाल में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इस मुद्दे को लेकर हिंसा होती रही है। मवेशियों के कई व्यापारियों को जान से मार दिया गया। इसके पहले, हरियाणा में कुछ दलितों को तब मार दिया गया था जब वे एक मरी हुई गाय की खाल उतार रहे थे। कुछ समय पूर्व ऊना (गुजरात) में मरी हुई गाय की खाल उतार रहे चार दलितों की सार्वजनिक रूप से बेरहमी से पिटाई की गई। यह घटना एक पुलिस स्टेशन के नज़दीक हुई। भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से इस तरह की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है।
तथ्य यह है कि वैदिक काल में भारत में गोमांस भक्षण आम था। जानेमाने इतिहासविद डी.एन. झा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘द मिथ ऑफ होली कॉऊ’’ (पवित्र गाय का मिथक) में इसकी पुष्टि की है। इस पुस्तक के प्रकाशन का हिन्दू राष्ट्रवादियों ने कड़ा विरोध किया था। जिस समय यह पुस्तक प्रकाशित होने जा रही थी, प्रो. झा को कई धमकी भरे टेलीफोन कॉल मिले। यह पुस्तक अत्यंत विद्वतापूर्ण और तथ्यात्मक है। प्राचीन भारतीय इतिहास के हवाले से यह पुस्तक बताती है कि आर्य भी गोमांस खाते थे। भगवान गौतम बुद्ध ने ब्राह्मणवादी यज्ञों में गाय की बलि देना बंद करने पर ज़ोर दिया था। उस समय भारत एक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था बनने की ओर था और बैल इस अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। बुद्ध ने समता का संदेश भी दिया, जो तत्कालीन ब्राह्मणवादी मूल्यों के विरूद्ध था। इसके बाद लंबे समय तक बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच संघर्ष चलता रहा। बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैल गया और ब्राह्मणवाद का सूरज का कुछ समय के लिए अस्त हो गया। जब ब्राह्मणवाद का पुनउर्दय हुआ तो उसने गाय को माता के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया।
‘गोमाता’ हिन्दू सम्प्रदायवादियों की राजनीति का भी एक प्रमुख हथियार रहा है। इस राजनीति के पैरोकार थे ऊँची जातियों के हिन्दू, जिन्हें राजाओं और ज़मींदारों का संरक्षण प्राप्त था। ब्राह्मणवाद ने हिन्दू धर्म का चोला पहन लिया और गाय को अपना प्रतीक घोषित कर दिया। परंतु आज भी हिन्दुओं सहित कई वर्गों के लोग गोमांस खाते हैं। मानवशास्त्रीय अध्ययनों से यह पता चलता है कि भारत में गोमांस भक्षण करने वाले कई समुदाय हैं। आदिवासियों व दलितों के कुछ तबकों और कुछ अन्य हिन्दू समुदाय इनमें शामिल हैं। गोवा, केरल और असम जैसे कई राज्यों में गोमांस खानपान का हिस्सा है।
जहां एक सांप्रदायिक धारा ने गाय को अपना प्रतीक बनाया वहीं दूसरी सांप्रदायिक धारा ने सूअर के मुद्दे पर भावनाएं भड़कानी शुरू कर दीं। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान दोनों धाराओं के सांप्रदायिकतावादियों ने समर्थन जुटाने के लिए इन मुद्दां का इस्तेमाल किया। जहां राष्ट्रीय आंदोलन धर्मनिरपेक्ष मुद्दों पर केन्द्रित था वहीं सांप्रदायिकतावादी, गाय और सुअर के मुद्दों को उछाल रहे थे।
स्वाधीनता के बाद, गोरक्षा के मुद्दे पर संविधानसभा में लंबी चर्चा हुई और अंततः यह निर्णय लिया गया कि इसे मूलाधिकारों का हिस्सा न बनाते हुए नीति निदेषक तत्वों में शामिल किया जाए। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने गांधीजी से यह अनुरोध किया कि वे गोहत्या और गोमांस को प्रतिबंधित करने के लिए काम करें। गांधी, जो कि 20वीं सदी के महानतम हिन्दू थे, ने इस अनुरोध को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और जब तक यहां ऐसे समुदाय हैं जो गोमांस भक्षण करते हैं, तब तक गोमांस को प्रतिबंधित करना अनुचित होगा।
हिन्दू संप्रदायवादियों ने राजनीति की बिसात पर गाय को लाने का पहला प्रयोग आज से ठीक 50 वर्ष पहले किया। सन 1966 के नवंबर में बडी संख्या में लोग इकट्ठे होकर संसद का घेराव करने पहुंचे। इसके बाद सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए इस पर विचार के लिए एक समिति नियुक्त की। समिति के समक्ष कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने अपने प्रतिवेदन दिए जिनमें आरएसएस के गोलवलकर शामिल थे। समिति किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी और लगभग एक दशक बाद उसे भंग कर दिया गया। यहां यह महत्वपूर्ण है कि 1966 के इस आंदोलन ने भाजपा के पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ को मिलने वाले मतों को दुगना कर दिया। इससे संप्रदायवादियों को यह समझ में आ गया कि गाय के मुद्दे का इस्तेमाल वोट कबाड़ने के लिए किया जा सकता है और तब से ही यह मुद्दा सांप्रदायिक शक्तियों की रणनीति का हिस्सा बन गया। आज 50 साल बाद भी वे लोग इस मुद्दे का इस्तेमाल अपना जनाधार बढ़ाने के लिए कर रहे हैं।
आज के भारत में गोमांस और गोरक्षा के मुद्दे पर मचे बवाल के दो प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे हैंः पहला, गोवध पर प्रतिबंध के कारण मवेशी व्यापारियों पर हमले हो रहे हैं और दूसरा, किसानों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है क्योंकि उनके अनुपयोगी पशुओं को खरीदने वाला अब कोई नहीं है। मवेशी व्यापारियों और कसाईखानों में काम करने वाले लोग अपने रोज़गार से वंचित हो रहे हैं। चमड़ा उद्योग, जो गाय की खाल पर निर्भर था, गर्त में जा रहा है और चमड़े का सामान उत्पादित करने वाली कई इकाईयां बंद हो गई हैं।
यह दिलचस्प है कि मांस का निर्यात करने वाली कई बड़े कंपनियों के मालिक वे लोग हैं जो भाजपा और उसकी राजनीति के समर्थक हैं। भारत, मांस का एक बड़ा निर्यातक है। नरेन्द्र मोदी ने सन 2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान गोमांस के मुद्दे को उठाया था। उन्होंने यूपीए सरकार पर ‘पिंक रेव्यूलेशन’ को प्रोत्साहन देने का आरोप लगाकर उसे कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी। संप्रदायवादियों का पाखंड स्पष्ट है। वे इस मुद्दे का उपयोग केवल अपने राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए करना चाहते हैं। राजस्थान की भाजपा सरकार ने एक ‘गोरक्षा विभाग’ का गठन किया और जयपुर के नज़दीक हिंगोलिया में एक विशाल गोशाला स्थापित की। वहां रखी गई गायों में से सैंकड़ों की मौत हो गई क्योंकि वहां न उन्हें खाना मिला और ना ही पानी। इससे यह जाहिर है कि गोरक्षकों का गोप्रेम केवल वोट पाने तक सीमित है।
ऊना की घटना के बाद दलितों का एक बड़ा तबका हिन्दुत्ववादी राजनीति के एजेंडे के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है। संघ परिवार की गाय पर केंद्रित राजनीति से कृषि अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऊना की घटना हमारी राजनीति का चरित्र बदल सकती है। एक ओर जहां इस मुद्दे का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है वहीं दलितों पर हमले हो रहे हैं। ऊना ने दलितों को आरएसएस की राजनीति के असली चेहरे से परिचित करवाया है। इससे विघटनकारी हिन्दुत्ववादी राजनीति का मुकाबला करने के लिए नए सामाजिक गठबंधन बनने की राह प्रशस्त हुई है। हमारे मन में सभी पशुओं के प्रति सम्मान और दया का भाव होना चाहिए परंतु किसी पशुका उपयोग राजनीति के लिए करना शर्मनाक और घृणास्पद है।

 -राम पुनियानी

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आपदा पीड़ितों से अधिक नौकरशाहों के पुनर्वास की चिन्ता
-जयसिंह रावत
देहरादून। उत्तराखण्ड में आपदा पीड़ितों या सीमाओं पर देश के लिये सर्वोच्च बलिदान देने के लिये तत्पर रहने वाले सैनिकों का  पुनर्वास हो या हो मगर जीवनभर हाकिमों की तरह प्रजा पर हुक्म चलाने वाले जनसेवकों का रिटायरमेंट से पहले ही पुनर्वास अवश्य हो जाता है। लोकसेवा और सूचना का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण आयोगों में जनता पर हुक्म चलाने वाले ये जनसेवक अपनी कुर्सी पहले ही पक्की कर देते हैं।
 उत्तराखण्ड के वर्तमान मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह अभी रिटायर भी नहीं हुये और उनके लिये राज्य सरकार ने पहले ही मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी परोस दी। उन्हें दिसम्बर में रिटायर होना हैं और उनकी मुख्य सूचना आयुक्त पद पर नियुक्ति पर 31 दिसम्बर को ही राजभवन की मुहर लग गयी। इसी प्रकार अक्टूबर सन् 2005 में रिटायर होने से कुछ दिन पहले तत्कालीन मुख्य सचिव रघुनन्दन सिंह टोलिया ने नये-नये खुले राज्य सूचना आयोग में अपने लिये मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी सुरक्षित करा ली थी। उत्तराखण्ड और खासकर पहाड़ के इस स्वयंभू हितैषी नौकरशाह ने आइएएस बिरादरी के पुनर्वास की परम्परा की जो बीमारी शुरू की वह केवल अब तक जारी है अपितु यह संक्रामक बीमारी अन्य सेवाओं में भी शुरू हो गयी है। उसके बाद तो मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिटायर्ड चीफ सेक्रेटरी के लिये सुरक्षित होने के साथ ही राज्य लोक सेवा आयोग जैसे अन्य आयोगों और प्रमुख संस्थाओं का मुखिया पद रिटायर्ड आइएएस अधिकारियों के लिये आरक्षित हो गये।़ सूचना आयोग में अब रिटायर्ड टोलिया के बाद नृपसिंह नपलच्याल 2010 में मुख्य सूचना आयुक्त बने और उसके बाद सुभाष कुमार को राज्य विद्युत नियामक आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया तो एन. रविशंकर को अगला मुख्य सूचना आयुक्त बनाने की तैयारी शुरू हो गयी। आपदा घोटाले में तत्कालीन राजनीतिक शासकों को क्लीन चिट देने के कारण प्रतिपक्ष के नेता अजय भट्ट के ऐतराज के कारण रवि शंकर की नियुक्ति तो नहीं हो पायी मगर उनके लिये जल आयोग अवश्य बन गया। शत्रुघ्न सिंह के रिटायरमेंट से एक महीना पहले ही उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त के तौर पर पुनर्वासित कर दिया गया।
राज्य में अजय विक्रम सिंह और मधुकर गुप्ता के बाद लगभग सभी मुख्य सचिवों को राज्य में कहीं कही पुनर्नियुक्त किया जाता रहा है। मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी खाली होने पर एस.के. दास को राज्य लोकसेवा अयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। जबकि इससे पहले इस पद पर राज्य के निवासी एक सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल जी.एस नेगी नियुक्त किये गये थे। लोकसेवा अयोग का अध्यक्ष पद ही नहीं बल्कि सदस्य पद भी उसके बाद रिटायर्ड आइएएस और पीसीएस के लिये अघोषित आरक्षित हो गये। मुख्य सचिव पद के लिये सूचना तथा लोकसेवा अयोग में पद खाली होने पर अगले मुख्य सचिव सुभाष कुमार को राज्य विद्युत नियामक आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। सुभाष कुमार के बाद एन रविशंकर रिटायर हुये तो राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त बनने में नेता प्रतिपक्ष ने रोड़े के कारण उनके लिये राज्य जल आयोग बना दिया गया। राज्य लोक सेवा आयोग के अलावा रिटायर नौकरशाहों के पुनर्वास के लिये अधीनस्थ सेवा आयोग भी बनाया गया। उसके अध्यक्ष पद अतिरिक्त मुख्य सचिव रहे एस. राजू को अध्यक्ष बना दिया गया। उनसे पहले उस पद पर भारतीय वन सेवा के डा0 रघुवीर सिंह रावत को अध्यक्ष बनाया गया था। जब सुभाष कुमार गये तो उनकी जगह जोड़तोड़ के बाद बहुचर्चित आइएएस राकेश शर्मा को बिठाया गया। राकेश शर्मा के 30 अक्ूबर 2015 को रिटायर होने से पहले ही उन्हें सेवा विस्तार देने का निर्णय राज्य सरकार ने ले लिये लेकिन केन्द्र सरकार तक शर्मा की ख्याति पहुंची हुयी थी इसलिये राज्य सरकार द्वारा पूरी ताकत झौंक देने के बाद भी मोदी सरकार ने क्लीन चिट नहीं दी। मजबूरन राज्य सरकार को इसहुनरमंदअधिकारी की असाधारण सेवाएं लेने के लिये उन्हें 15 नवम्बर 2015 को मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव पद पर बिठाना पड़ा।
इस अफसर के लिये राज्य सरकार को असाधारण ढंग से व्यवस्था करनी पड़ी। बाद में उन्हें राजस्व परिषद का अध्यक्ष भी बना दिया गया। जबकि यह पद आइएएस संवर्ग के लिये नहीं था। यह बात दीगर है कि वर्तमान राजनीतिक शासक अब राकेश शर्मा पर की गयी मेहरबानियों के लिये माथा पीट रहे हैं। सुना गया है कि वह अब कांग्रेस के बजाय भाजपा से किच्छा सीट पर टिकट का जुगाड़ कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस की सरकार ने उन्हें मुख्यमंत्री के बाद दूसरा सत्ता का केन्द्र बना दिया था।
मुख्य सचिव ही नहीं बल्कि राज्य सरकार अन्य आइएएस अधिकारियों को भी पुनर्वासित करने के लिये उन्हें सेवा का विस्तार या अन्य जगहों पर एडजस्ट करती रही है। सन् 2012 में राज्य सरकार ने डीके कोटिया को दो बार सेवा का विस्तार दिया जबकि वह 30 सितम्बर 2012 को रिटायर हो गये थे। उन्हें मार्च 2013 तक प्रमुख सचिव पद पर सेवा का अवसर मिला। आइएएस सुरेन्द्र सिंह रावत जब 30 जून 2013 को रिटायर हुये तो उन्हें जुलाइ 2013 तक सेवा विस्तार दे दिया गया और बाद में उन्हें पाच साल के लिये राज्य सूचना आयुक्त  बना दिया गया। सुवर्द्धन 30 जून 2013 को रिटायर हो रहे थे लेकिन उन्हें सितम्बर तक के लिये सेवा विस्तार देने के बाद राज्य निर्वाचन आयुक्त का संवैधानिक पद दे दिया गया। आइएएस रमेश चन्द्र पाठक भी 30 जून 2013 को सेवा निवृत्त हो रहे थे और उन्हें भी सितम्बर 2013 तक सेवा विस्तार दे दिया गया। अतिरिक्त मुख्य सचिव पद पर रहे एस.के.मट्टू 31 सितम्बर को रिटायर हो गये थे। उन्हें 1 अगस्त 2013 से अगले छह मोह तक के लिये एक्सटेंशन दे दिया गया। सीएमएस बिष्ट 30 सितम्बर 2014 को रिटायर हो रहे थे और उन्हें दिसम्बर 2014 तक सेवा विस्तार देने के बाद लोकसेवा आयोग का सदस्य भी बना दिया गया। एस. राजू 31 मार्च 2016 को रिटायर हो गये। उन्हें भी मुख्य सूचना आयुक्त के पद का लालच मिला था लेकिन परिस्थितियां अनुकूल होने के कारण उन्हें अधीस्थ सेवा आयेग का अध्यक्ष बना दिया गया। पीएस जंगपांगी 13 जनवरी 2016 को रिटायर हो गये थे। उन्हें 2 वर्ष के लिये राजस्व परिषद का न्यायिक सदस्य बना दिया गया। एक निगम के आला अधिकारी को नोटों के बंडल लेते सारी दुनिया ने देखा और सरकार ने उसे तीसरी बार सेवा विस्तार दे दिया।







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