दो दिन भी नहीं टिकी उत्तराखंड सरकार भराड़ीसैण में

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

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तुगलकाबाद और दौलताबाद के बीच फंसी उत्तराखंड राज्य की राजधानी

शनिवार, 2 दिसंबर 2017




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Political Pests are Biting Rare Resources of Uttarakhand

बुधवार, 29 नवंबर 2017


उत्तराखण्ड के संसाधनों पर राजनीतिक दीमक
-जयसिंह रावत
उत्तराखण्ड में दीवाली के अवसर पर कार्यकर्ताओं और नेताओं को मलाईदार और हनकदार ओहदों की पहली खेप मिलने की चर्चाएं शुरू हो गयी हैं। प्रदेश कर्ज के बोझ तले डूबता जा रहा हैं, संसाधन सिकुड़ते जा रहे हैैं और राजनीतिक दीमक उन संसाधनों को चाटने के लिये उतावले हुये जा रहे हैं। इधर सरकार के पास विकास के नाम पर चार आने भी नहीं है। केन्द्र और राज्य के करों के अलावा करेत्तर राजस्व से भी सरकार और उसके कर्मचारियों का खर्च नहीं चल पा रहा है और इसके लिये भी सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा है।
प्रदेश के 2,31,835 राजपत्रित और अराजपत्रित कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिश से बढ़े हुये वेतनमान देने से राज्य पर फिलहाल लगभग 3200 करोड़ का बोझ बढ़ गया है। पिछले छह महीनों में ही सरकार ने वेतन आदि के लिये लगभग 1800 करोड़ कर्ज ले लिये। वर्तमान बजट में वेतन भत्ते और मजदूरी आदि पर 31.01 प्रतिशत राशि का प्रावधान रखा गया है। अनुदान और राज सहायता पर 12.91 प्रतिशत राशि खर्च होने का अनुमान है।10.71 प्रतिशत पेंशन और 13.59 प्रतिशत अन्य व्ययों के लिये प्राविधानित किये गये हैं। सरकार ने मात्र 13.59 प्रतिशत राशि निर्माण या विकास कार्यों पर खर्च करने का प्रावधान रखा है जिसके लिये सरकार के पास धन ही नहीं है। राज्य सरकार के चालू बजट पर गौर करें तो उसकी दयनीय माली हालत का पता चल जाता है। सरकार ने वेतन मद में 16131.81 करोड़ रुपये रखे हुये हैं। इसके अलावा भारी भरकम कर्ज के ब्याज के रूप में ही सरकार को 4409.95 करोड़ तथा कर्ज की किश्त के रूप में 2640.23 करोड़ की रकम चुकानी होगी। कुल मिला कर इन्हीं मदों के लिय सरकार को हर हाल में 23181.99 करोड़ की जरूरत होगी। इसमें अभी निगम कर्मियों को सातवें वेतन के लाभ का आंकलन शामिल नहीं है। जबकि सरकार को अनुमान है कि उसे 13780.28 करोड़ अपने कर राजस्व से तथा 7113.48 करोड़ केन्द्रीय करों से हिस्से के रूप में मिलेंगे। इस आंकलन को जोड़ा जाय तो कुल रकम 23362.47 रुपये बैठती है। इतनी ब़ड़ी रकम जुटने की संभावना इसलिये भी नहीं है, क्योंकि मोबाइल दुकानों से घर-घर शराब पहुंचाने के बाद भी अपेक्षित रकम मिलने की उम्मीद नहीं है। इसी तरह अदालत और एनजीटी के हस्तक्षेप से खनन आदि की रायल्टी से भी बहुत कम राजस्व मिलने का अनुमान है। विमुद्रीकरण के कारण रियल इस्टेट में जो मन्दी आयी है उससे स्टांप ड्यूटी से भी कोई खास रकम आने की उम्मीद नहीं है। चलो माना कि सरकार को अपेक्षित रकम मिल भी गयी तो भी उसे पूरे बजट के लिये रु0 39957.79 करोड़ की जरूरत है। जबकि सारे जोड़ घटाने और आयबृद्धि की खुशफहमी के बाद भी केवल 23362.47 करोड़ की आय की ही उम्मीद है। शेष 16595.32 करोड़ कहां से आयेंगे? इस गैप को पूरा करने के लिये कम से कम 8010.00 करोड़ रुपये का कर्ज बाजार से उठाने का इरादा है। अगर इतने छोटे से राज्य की सरकार हर साल 8 हजार करोड़ से अधिक के कर्ज उठायेगी तो आने वाले समय में इस राज्य के दिवालियेपन की सहज ही कल्पना की जा सकती है। लेकिन सत्ता के दलालों और इस राज्य की फूटी किश्मत पर लगे दीमकों को तो ‘‘पौंड ऑफ फ्लैश’’ मतलब जीवित इंसान के किसी भी हिस्से से एक पौंड गोश्त निकालने की उतावली हो रही है, भले ही वह इंसान मर क्यों जाय!
अभी निगम कर्मियों को भी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतन वृद्धि देनी है जिसकी मार सरकार पर अरबों रुपयों के रूप में पड़ेगी। विकास कार्य केवल घोषणाओं तक सीमित हैं। और सत्ताधारी दल के लोग मलाईदार ओहदों के लिये लपलपा रहे हैं। चूंकि मुख्यमंत्री सहित तमाम बड़े नेताओं के कृपापात्र बाहरी लोग सलाहकार और कोर्डिनेटर जैसे मलाईदार पदों पर बैठ चुके हैं इसलिये अब पार्टी के उन कार्यकर्ताओं और नेताओं का पदों के लिये ब्यग्र होना और चुनावों की मेहनत का पारितोषिक पाने की लालसा पालना स्वाभाविक ही है जिनके प्रयासों से पार्टी सत्ता में पहुंची है। देखा जाय तो राजनीतिक दलों के लेबल भले ही अलग-अलग हों मगर अन्दर मैटीरियल एक ही होता है। पिछला अनुभव बताता है कि राजनीतिक जीवों को प्रदेश की वित्तीय दुर्दशा की नहीं बल्कि अपने ऐशो आराम की चिन्ता अधिक होती है। ये राजनीतिक जीव उत्तराखण्ड की आर्थिकी और उसके संसाधनों पर दीमक और जोंक का काम कर रहे हैं। एक-एक दायित्वधारी पर सरकार के करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। प्रदेश की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने इस प्रदेश के विकास की ठोस  बुनियाद तो अवश्य रखी मगर उस बुनियाद पर उन्होंने लालबत्तीधारी दीमकों की बांदी भी जरूर चिपका दी। फिर भी तिवारी के जमाने में एक दायित्वधारी को ढाइ हजार रुपये मानदेय और एक सीमित मात्रा में गाड़ी का पेट्रोल मिलता था। राज्य के सबसे ईमान्दार नेता के रूप में प्रचारित भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने वह मानदेय 8 हजार और 10 हजार कर दिया। यही नहीं उनकी कारों के पेट्रोल की सीमा भी हटा दी। दुर्भाग्य देखिये कि विधायकों को लालबत्ती या मंत्रियों के जैसे ठाठ देने के लिये लगभग सौ मलाईदार पदों को लाभ की श्रेणी से हटा दिया गया है। यह संवैधानिक पाप केवल कांग्रेस ही नहीं बल्कि भाजपा भी करती रही है। शुक्र है कि अदालत ने संसदीय सचिव पद को भी मंत्रिमण्डल का हिस्सा मान लिया। वरना अब तक मंत्री पद के दावेदार दर्जनभर विधायकों को संसदीय सचिव पद पर भी एडजस्ट कर दिया गया होता।

जयसिंह रावत
-11, फ्रेंड्स एन्कलेव, शाहनगर,
डिफेंस कालोनी रोड, देहरादून

मोबाइल-9412324999

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कांवड़ियों और इको टूरिस्टों में फर्क नहीं जानती उत्तराखंड सरकार


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स्वच्छ भारत अभियान : चश्मा गांधी का और नजर मोदी की


चश्मा गांधी का और नजर मोदी की
-जयसिंह रावत
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान में गांधी जी के चश्मे को लेकर काफी वाद विवाद चल रहा है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र के एक शीर्ष प्रतिनिधि ने भी इस अभियान में गांधी जी के चश्मे के उपयोग पर व्यंग्यात्मक और नकारात्मक टिप्पणी की है। सुप्रीमकोर्ट ने तो शौचालयों आदि स्थानों पर गांधी के प्रतीक के रूप में उनके चश्मे के ढांचे के उपयोग को निषिद्ध कर दिया है। आलोचनाओं को दरकिनार कर देखा जाय तो इस अभियान में गांधी के चश्मे के उपयोग में बुराई नहीं बल्कि अभियान के कृयान्वयन और लक्ष्य में कमी है। वह भी इसलिये कि इसमें भले ही चश्मा गांधी का हो मगर उसमें नजर मोदी की ही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय अभियानस्वच्छ भारत अभियानके बारे में संयुक्त राष्ट्र के विशेष अधिकारी (यूएनएसआर) लियो हेल्लर ने अपने प्रारम्भिक दौरे की रिपोर्ट में टिप्पणी की है कि वह जहां भी गये उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन का लोगो (महात्मा गांधी के चश्मे) को देखा। मिशन लागू होने के तीसरे साल में, अब यह जरूरी हो गया है कि उन चश्मों को मानव अधिकारों के लेंस से बदला जाए। हेल्लर ने मानवाधिकार का सवाल भी उठाया है। उठाते भी क्यों नहीं? संसद ने मैला ढोने वालों के रूप में रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास हेतु सितम्बर 2013 में बनाया और यह दिसम्बर 2014 में अमल में आया। इसका उद्देश्य मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह समाप्त करना और पहचाने गए मैला ढोने वालों का विस्तृत पुनर्वास करना है। लेकिन देश में इस कुप्रथा पर अब तक पूरी तरह रोक नहीं लग सकी।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की वर्ष 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 1992 से लेकर 2005 के बीच देश में कुल 7,70,338 हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों की पहचान हुयी थी जिनमें से 4,27,870 कर्मियों का पुनर्वास कर लिया गया था। इसके बाद 3,42,468 हाथ से मैला उठाने वाले कार्मिक रह गये थे। मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार ऐसे स्वच्छाकारों की पहचान के लिये 2007 में फिर अभियान चला तो उसमें 1.18 लाख कर्मियों की पहचान हुयी। इनमें से 78,941 सफाई कर्मियों को अन्य व्यवसाय चलाने के लिये आर्थिक सहायता दी गयी। लेकिन उनमें से कितनों ने हाथ से मैला उठाने या सिर पर मैला ढोने का काम छोड़ा, इसका उल्लेख सरकारी रिपोर्ट में कहीं नहीं है। वैसे भी आर्थिक सहायता देने की औपचारिकता पूरी किये जाने का मतलब यह नहीं कि उन सभी ने हाथ से मैला उठाना छोड़ दिया होगा। हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों की संख्या में उत्तर प्रदेश पहले नम्बर पर तथा मध्यप्रदेश दूसरे, महाराष्ट्र तीसरे और गुजरात चौथे नम्बर पर है। इन कार्मियों में निजी तौर पर काम करने वाले या नगर निकायों में नियमित या अनियमित तौर पर सीवर लाइनों/सेप्टिक टैंकों पर काम करने वाले कार्मिक शामिल नहीं हैं। अगर महात्मा गांधी के चश्मे से उनकी ही नजर से देखा जाता तो सडक़ों पर झाड़ू लेकर फोटो खिंचवाने के बजाय एक मानव को दूसरे मानव का मैला उठाने के कृत्य को सबसे अधिक गंभीरता से लिये जाता। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2014 में सफाई कर्मचारी आन्दोलन बनाम भारत सरकार एवं अन्य मामले में सभी राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों को मेन होलों और सेप्टिक टैंकों में सफाई के दौरान मरने वालों का आंकड़ा तैयार कर प्रति परिवार 10 लाख मुआवजा देने के आदेश दिये थे।
सन् 1901 में गांधीजी ने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में स्वयं अपना मैला साफ करने की पहल की थी। उन्होंने 1918 में साबरमती आश्रम शुरू किया तो उसमें पेशेवर सफाई कर्मी लगाने के बजाय आश्रमवासियों को अपना मैला साफ करने का नियम बनाया। श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1984 में लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान कहा था कि उन्होंने साबरमती आश्रम में स्वयं अपना मैला साफ किया था। आधुनिक शौचालयों के इस दौर में किसी से इंदिरागांधी की तरह अपना मैला स्वयं साफ करने की उम्मीद तो नहीं की जा सकती है मगर यह सवाल जरूर उठाया जा सकता है कि कानूनन प्रतिबंध के बावजूद आज भी देश में लाखों लोग दूसरों का मैला अपने सिर पर क्यों ढो रहे हैं?
गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से पुनः 1915 में भारत लौटे तो उन्होंने गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर भारत यात्रा शुरू की। इसी क्रम में वह पहले रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने कलकत्ता गये और  फिर मुंशीराम से मिलने हरिद्वार चले आये। गांधीजी ने अपनी हस्तलिखित डायरी में कलकत्ता और हरिद्वार में मैला साफ करने के लिये गड्ढे खोदने और मल को स्वयं मिट्टी से ढकने का उल्लेख किया है। गांधीजी जी की हरिद्वार यात्रा के बारे में उनकी हस्तलिखित डायरी के विवरण पर गौर करना भी जरूरी ही है। गांधीजी ने डायरी में लिखा है कि.... ‘‘ऋषिकेश और लक्ष्मण झूले के प्राकृतिक दृष्य मुझे बहुत पसन्द आये। .........परन्तु दूसरी ओर मनुष्य की कृति को वहां देख चित्त को शांति हुयी। हरद्वार की तरह ऋषिकेश में भी लोग रास्तों को और गंगा के सुन्दर किनारों को गन्दा कर डालते थे। गंगा के पवित्र पानी को बिगाड़ते हुये उन्हें कुछ संकोच होता था। दिशा-जंगल जाने वाले आम जगह और रास्तों पर ही बैठ जाते थे, यह देख कर मेरे चित्त को बड़ी चोट पहुंची........
हरिद्वार जैसे धर्मस्थलों पर भौतिक और नैतिक गंदगी के बारे में गांधी जी ने डायरी में लिखा था कि....“निसंदेह यह सच है कि हरद्वार और दूसरे प्रसिद्ध तीर्थस्थान एक समय वस्तुतः पवित्र थे। ...... लेकिन मुझे कबूल करना पड़ता है कि हिन्दू धर्म के प्रति मेरे हृदय में गंभीर श्रद्धा और प्राचीन सभ्यता के लिये स्वाभाविक आदर होते हुये भी हरद्वार में इच्छा रहने पर भी मनुष्यकृत ऐसी एक भी वस्तु नहीं देख सका, जो मुझे मुग्ध कर सकती........पहली बार जब 1915 में मैं हरद्वार गया था, तब भारत-सेवक संघ समिति के कप्तान पं. हृदयनाथ कुंजरू के अधीन एक स्वयंसेवक बन कर पहुंचा था। इस कारण मैं सहज ही बहुतेरी बातें आखों देख सका था ....... लेकिन जहां एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत-शिखरों ने मुझे मोह लिया, वहां दूसरी ओर मनुष्य की करतूतों को देख मेरे हृदय को सख्त चोट पहुंची और हरद्वार की नैतिक तथा भौतिक मलिनता को देख कर मुझे अत्यंत दुख हुआ। इस बार की यात्रा में भी मैंने हरद्वार की इस दशा में कोई ज्यादा सुधार नहीं पाया। पहले की भांति आज भी धर्म के नाम पर गंगा की भव्य और निर्मल धार गंदली की जाती है। गंगा तट पर, जहां पर ईश्वर-दर्शन के लिये ध्यान लगा कर बैठना शोभा देता है, पाखाना-पेशाब करते हुये असंख्य स्त्री-पुरुष अपनी मूढ़ता और आरोग्य के तथा धर्म के नियमों को भंग करते हैं। तमाम धर्म-शास्त्रों में नदियों की धारा, नदी-तट, आम सड़क और यातायात के दूसरे सब मार्गों को गंदा करने की मनाही है। विज्ञान शास्त्र हमें सिखाता है कि मनुष्य के मलमूत्रादि का नियमानुसार उपयोग करने से अच्छी से अच्छी खाद बनती है। आरोग्यशास्त्री कहते हैं कि उक्त स्थानों में मल-मूत्रादि का विसर्जन करना मानव-समाज की घोर अवज्ञा करना है। यह तो हुयी प्रमाद और अज्ञान के कारण फैलने वाली गंदगी की बात। धर्म के नाम पर जो गंगा-जल बिगाड़ा जाता है, सो तो जुदा ही है। ....विधिवत् पूजा करने के लिये मैं हरद्वार में एक नियत स्थान पर ले जाया गया। जिस पानी को लाखों लोग पवित्र समझ कर पीते हैं उसमें फूल, सूत, गुलाल, चावल, पंचामृत वगैरा चीजें डाली गयीं। जब मैंने इसका विरोध किया तो उत्तर मिला कि यह तो सनातन् से चली आयी एक प्रथा है। इसके सिवा मैंने यह भी सुना कि शहर के गटरों का गंदला पानी भी नदी में ही बहा दिया जाता है, जो कि एक बड़े से बड़ा अपराध है..... दरअसल गांधीजी के मन में मैले से खाद बनाने का विचार 1908 में तब आया था जब वह दक्षिण अफ्रीका में टॉलस्टॉय फार्म पर रहते थे। वैसे भी यूरोपीय देशों में मलव्ययन में सफाईकर्मी की व्यवस्था तो थी मगरनाइट स्वायलके तौर पर उसका उपयोग खाद के रूप में करने का प्रचलन भी वहां था।
भारत को स्वच्छ बनाने के लिये केवल गांधी के चश्मे के ढांचे से काम चलने वाला नहीं है। इसके लिये गांधी की सोच पर सम्पूर्णता से विचार किये जाने की जरूरत है।
जयसिंह रावत
पत्रकार
-11, फ्रेंड्स एन्क्लेव, शाहनगर,
डिफेंस कालोनी रोड, देहरादून।
मोबाइल-09412324999
jaysinghrawat@hotmail.com

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