सात समुन्दर पार च ब्वे जाज मा जान की ना। This is a song sung by those worriers who fought in the world war 1st and 2nd.

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

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सात समुन्दर पार च ब्वे जाज मा जान की ना। This is a song sung by those worriers who fought in the world war 1st and 2nd.

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नोटबंदी और जीएसटी से त्रस्त ट्रांसपोर्टर ने उत्तराखण्ड के कृषिमंत्री के दरबार में जहर खाया

शनिवार, 6 जनवरी 2018


जहर खाने वाले ने कहा मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र  बिल्कुल बेकार है

नोटबंदी और फिर जीएसटी से बरबाद हुये काठगोदाम के एक ट्रांसपोर्ट व्यवसायी ने भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय में कृषिमंत्री सुबोध उनियाल के जनता दरबार में जहर खा कर व्यवस्था का विभत्स चेहरा उजागर कर दिया। जहर खाने वाले व्यवसायी प्रकाश पाण्डे को मैकस अस्पताल में भर्ती किया गया है जहां उनकी हालत बेहद गंभीर बतायी जाती है। जहर खाने के बाद मंत्री के समक्ष प्रकाश पाण्डे ने जीएसटी और नोटबंदी के खिलाफ जो बोलना था सो बोल दिया मगर इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बेकार हैं और किसी की नहीं सुनते हैं। इस कांड से जीरो टालरेंस की सरकार की पोलपट्टी भी खुल गयी है।
भाजपा प्रदेश मुख्यालय में शनिवार को दोपहर डेढ़ बजे जनता मिलन कार्यक्रम शुरू हुए आधा घंटा भी नहीं गुजरा था, कि काठगोदाम-हल्द्वानी निवासी ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडेय हाथ में ज्ञापन लेकर वहां पहुंच गया। उसने रोना-चिल्लाना शुरू कर दिया। उसने बताया कि वह सिद्धिविनायक ट्रांसपोर्ट कंपनी का मालिक है।
जहर खाने की खबर लगते ही भाजपा कार्यक्रम में हड़कंप मच गया। फरियादी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर आरोप लगाते हुए कहा कि, ‘‘ये मुख्यमंत्री बिल्कुल बेकार है,किसी की नहीं सुनता।’’ इस शख्स ने बताया कि जीएसटी और नोटबंदी ने उसकी हालत खराब कर दी है और इसी वजह से उसने ये कदम उठाया।
इस बीच, उसने मंत्री की टेबल पर कुछ पाउच-रैपर रखकर बताया कि उसने जहर खा लिया है। मंत्री सुबोध उनियाल ने तुरंत उसे हॉस्पिटल ले जाने के लिए कहा।  लेकिन साथ ही यमीडिया से यह कहना नहीं भूले कि यह भाजपा के खिलाफ षढ़यंत्र है। इस दौरान, पांडे ने कई बार उल्टियां कीं और उसका बीपी लो हो गया। आईसीयू में उसका उपचार किया गया। बाद में उसकी हालत को देखते हुए उसे मैक्स हॉस्पिटल भर्ती करा दिया गया। अस्पताल में उनकी हालत बेहद नाजुक बतायी जाती है। इस बीच जहर खाने से पहले किसी वीरेन्द्र से उनकी मोबाइल पर वार्ता भी वायरल हुयी है जिसमें उन्होंने अपनी आपबीती बताने के साथ ही उत्तराखण्ड सरकार संवेदनहीनता और जनविरोधी रुख का खुलासा भी किया है। पाएडे ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री के ओएसडी ने उनसे फर्जी बीपीएल कार्ड बनाने की सलाह दी थी ताकि मुख्यमंत्री से वह 10-20 हजार की मदद दिला सके। जबकि पाण्डे ने ओएसडी से कहा  िकवह 4 गाड़ियों का मालिक है फिर बीपीएल कार्ड कैसे बना सकता है। वह सरकारी विभागों में फंसा अपना पैसा वापस मांग रहा है जिसके लिये प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कोई मदद नहीं कर रहे हैं।
प्रकाश पांडे काठगोदाम नई कालोनी तल्ला निवासी कैप्टन सुनील कुमार थापा के मकान में करीब 16 साल से किराए पर परिवार के साथ रह रहे हैं। माता-पिता छोटे बेटे ललित के साथ नई बस्ती काठगोदाम में रहते हैं। छोटे भाई ललित सुशीला तिवारी अस्पताल में कार्यरत हैं। पिता काठगोदाम रोडवेज के पास परचून की दुकान करते हैं। शनिवार दोपहर पहले कई लोगों के फोन घनघनाए कि प्रकाश पांडे ने जनता मिलन कार्यक्रम कार्यक्रम में जहर खा लिया है।






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उत्तराखण्ड में अघोषित इमरजेंसी

गुरुवार, 4 जनवरी 2018





                            उत्तराखण्ड में अघोषित इमरजेंसी

शासन प्रशासन में पारदर्शिता लाने के लिये ही भारत नागरिकों को सूचना का अधिकार मिला था। सुप्रीमकोर्ट ने भी एक बार कहा था कि जब तक शासन-प्रशासन में पारदर्शिता हो और आम आदमी, जो कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का एक अंग है, को जब तक शासन प्रशासन में हो रही गतिविधियों की जानकारी हो तो तब तक संविधान के अनुच्छेद 19 (1) () में प्रदत्त अभिव्यक्ति एवं भाषण की स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है। सत्तर के दशक में इमरजेंसी के दौरान नागरिकों के इस मौलिक अधिकार का हनन हुआ था जिसका रोना आज भी वे लोग रो रहे हैं जो कि स्वयं नागरिकों के इस अधिकार का परोक्ष रूप से हनन कर रहे हैं। उत्तराखण्ड सरकार के पत्रकारों को सचिवालय से दूर रखने के ताजा आदेश की मूल भावना भी इमरजेंसी के दौरान की ज्यादतियों के पीछे की मंशा से मेल खाती हैं। एक तरफ तो मुख्यमंत्री और उनके सिपहसालार जीरो टालरेंस का राग अलापते थक नहीं रहे हैं और दूसरी तरह वे नहीं चाहते कि उनके कामकाज पर मीडिया के जरिये आम आदमी नजर रखे। अगर आप सचमुच जीरो टालरेंस में यकीन रखते हैं तो अपने कामकाज के सार्वजनिक होने से इतने खौफजदा क्यों हैं? दरअसल त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार शुरू के दिन से जो अपरिपक्वता और अनुभवहीनता का परिचय देती रही है उसी अपरिपक्वता का यह अगला क्रमांक है जिस पर सरकार की छिछालेदर होनी स्वाभाविक ही है। कहते हैं कि नादान की दोस्ती से जी का जंजाल ही होता है। जिस तरह के सलाहकार त्रिवेन्द्र सिंह जी देहरादून और दिल्ली से पकड़ कर लाये हैं उनसे यही उम्मीद की जा सकती थी। टेलिविजन में एंकरिंग का न्यूज रिपोर्टिंग से या पत्रकारिता से संबंध नहीं होता। जिनका रिपोर्टिंग से संबंध रहा वे अगर अपने पेशे के प्रति बफादार होते तो पेशे से अधिक नेताओं की चाकरी में भलाई नहीं समझते और गिरगिट की तरह रंग नहीं बदलते। अभी तो यह शुरुआत ही है। आगे-आगे देखिये होता है क्या? सूचना विभाग के मर्यादा पुरुषोत्तम मुखिया ने पत्रकारों के लिये सचिवालय के अलग पास बनाने की योजना बनायी थी। उसके आवेदन में पूछा गया था कि आप सचिवालय में क्यों जाना चाहते हैं और किस-किस के पास जाना चाहते हैं। जिस आदमी का नजरिया ही पत्रकारों के प्रति अपमानजनक हो उसे सूचना विभाग का महानिदेशक बनाना भी पत्रकारों का उत्पीड़न ही है। गैरों पे करम अपनों पे सितम........का रास्ता अपनाया होता तो आज यह स्थिति नहीं आती। भाजपा में देवेन्द्र भसीन जैसे पढ़े लिखे, सौम्य और अनुभवी लोग होने के बावजूद मीडिया सलाहकार जैसे पदों पर इधर उधर से नाबालिग जैसे लड़कों को पकड़ कर ले आये। मीडिया सलाहकार ने एक बार मुझे भी पूछा था कि मैं क्या काम करता हूं। ये भी पूछा था कि मैं किस तरह की पत्रकारिता करता हूं? महानिदेशक के पास गया तो श्रीमान जी ने अपमानित कर भगा दिया। इस सरकार में कहीं सुनवाई तो होती नहीं। शिकायत भी करें तो किससे?लगता है कि यह राज्य अंधेर नगरी चौपट....की ओर बढ़ रहा है। मंत्री सरकारी योजनाओं की जगह अपना प्रचार कर रहे हैं। प्रदेश के पर्यटन स्थलों का प्रचार देश विदेश में होना चाहिये था, यहां के मंदिरों का प्रचार देश के अन्य कोनों में होना था लेकिन देश के उन कोनों में मंत्री की तस्बीर छपने से मंत्री को क्या लाभ? एक मंत्री की बेलगाम जुबान के कारण आज सवाल उठने लग गया है कि लोग अपनी बेटियों को कैसे खिलाड़ी बनायेंगे?

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